उत्तराखंड में जारी भारी बारिश के बीच एक बार फिर वहां की नदियों पर बांध बनाए जाने का विरोध तेज हो गया है। वर्ल्ड बैंक समेत तमाम वित्तीय संस्थानों से कहा जा रहा है कि वह पहाड़ के हालात पर गौर करते हुए राज्य की नदियों पर पावर प्रोजेक्ट बनाने के लिए पैसा न दें। गंगा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे लोगों ने हाल में जोशीमठ में वर्ल्ड बैंक के अधिकारियों का घेराव किया और उनसे विष्णुगाड़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना को समर्थन न देने को कहा। 444 मेगावॉट के इस प्रोजेक्ट का निर्माण टिहरी बांध को बनाने वाली कंपनी (टीएचडीसीआईएल) कर रही है।
'पावर प्रोजेक्ट से भयंकर नुकसान'
गंगा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे माटू जन संगठन के विमल भाई कहते हैं कि विष्णुगाड़-पीपलकोटी प्रोजेक्ट के कारण स्थानीय लोगों की जमीन डूब जाएगी और काफी बड़े इलाके में लोगों को नदी के पानी से महरूम होना पड़ेगा, क्योंकि बिजली बनाने के लिए धौलीगंगा को सुरंगों से गुजारा जाएगा। इसके कारण स्थानीय पर्यावरण पर असर पड़ना तय है। वह बताते हैं कि पावर प्रोजेक्ट के लिए सुरंग बनाए जाने के कारण लोगों के घरों में दरारें आ रही हैं और स्थानी जल स्रोत सूख रहे हैं।
'2013 की आपदा के लिए बांध जिम्मेदार'
पर्यावरण कार्यकर्ता नवीन मटियाल के मुताबिक, वर्ल्ड बैंक ने पर्यावरण के मानकों की अनदेखी को नजरअंदाज करते हुए महज एक साहूकार की तरह इस परियोजना के लिए लोन दिया है। उनका कहना है कि परियोजना का विरोध करने वाले लोगों को सरकार प्रताड़ित कर रही है और उन पर झूठे केस दर्ज किए जा रहे हैं। सीपीएम नेता बस्सी लाल ने वर्ल्ड बैंक से इस परियोजना को छोड़ने को कहा है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की एक कमिटी ने भी 2013 की आपदा के लिए उत्तराखंड में बनाए गए बांधों को जिम्मेदार माना था।
'जनता के विरोध को लगातार अनसुना किया'
उत्तराखंड की नदियों पर बांध बनाने का विरोध 1965 से जारी है। तब टिहरी पावर प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई थी। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए दो सदी पुराने टिहरी शहर समेत करीब 125 गांवों को बांध के मुंह में धकेल दिया गया था। इसके साथ ही करीब 100 गांवों को आंशिक रूप से बांध की भेंट चढ़ा दिया गया। विमल भाई के मुताबिक, सरकार की ओर से दावा किया गया था कि टिहरी बांध से 2400 मेगावॉट बिजली बनाई जाएगी, मगर बन रही है करीब एक तिहाई। उनका कहना है कि 2013 में उत्तराखंड में आई आपदा के दौरान टिहरी बांध के कारण देश के एक बड़े इलाके पर खतरा पैदा हो गया था। उनका कहना है कि सरकार ने टिहरी के बाद राज्य में एक के बाद एक कई बांध बनाए और जनता के विरोध को लगातार अनसुना किया।
Navbhart times 14-7-2015
'पावर प्रोजेक्ट से भयंकर नुकसान'
गंगा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे माटू जन संगठन के विमल भाई कहते हैं कि विष्णुगाड़-पीपलकोटी प्रोजेक्ट के कारण स्थानीय लोगों की जमीन डूब जाएगी और काफी बड़े इलाके में लोगों को नदी के पानी से महरूम होना पड़ेगा, क्योंकि बिजली बनाने के लिए धौलीगंगा को सुरंगों से गुजारा जाएगा। इसके कारण स्थानीय पर्यावरण पर असर पड़ना तय है। वह बताते हैं कि पावर प्रोजेक्ट के लिए सुरंग बनाए जाने के कारण लोगों के घरों में दरारें आ रही हैं और स्थानी जल स्रोत सूख रहे हैं।
'2013 की आपदा के लिए बांध जिम्मेदार'
पर्यावरण कार्यकर्ता नवीन मटियाल के मुताबिक, वर्ल्ड बैंक ने पर्यावरण के मानकों की अनदेखी को नजरअंदाज करते हुए महज एक साहूकार की तरह इस परियोजना के लिए लोन दिया है। उनका कहना है कि परियोजना का विरोध करने वाले लोगों को सरकार प्रताड़ित कर रही है और उन पर झूठे केस दर्ज किए जा रहे हैं। सीपीएम नेता बस्सी लाल ने वर्ल्ड बैंक से इस परियोजना को छोड़ने को कहा है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की एक कमिटी ने भी 2013 की आपदा के लिए उत्तराखंड में बनाए गए बांधों को जिम्मेदार माना था।
'जनता के विरोध को लगातार अनसुना किया'
उत्तराखंड की नदियों पर बांध बनाने का विरोध 1965 से जारी है। तब टिहरी पावर प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई थी। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए दो सदी पुराने टिहरी शहर समेत करीब 125 गांवों को बांध के मुंह में धकेल दिया गया था। इसके साथ ही करीब 100 गांवों को आंशिक रूप से बांध की भेंट चढ़ा दिया गया। विमल भाई के मुताबिक, सरकार की ओर से दावा किया गया था कि टिहरी बांध से 2400 मेगावॉट बिजली बनाई जाएगी, मगर बन रही है करीब एक तिहाई। उनका कहना है कि 2013 में उत्तराखंड में आई आपदा के दौरान टिहरी बांध के कारण देश के एक बड़े इलाके पर खतरा पैदा हो गया था। उनका कहना है कि सरकार ने टिहरी के बाद राज्य में एक के बाद एक कई बांध बनाए और जनता के विरोध को लगातार अनसुना किया।
Navbhart times 14-7-2015
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