चौखुटिया: एक जमाने में पहाड़ के गांवों में स्थित धारे व नौलों का अपना
खास प्रचलन था। जो यहां के जीवन व संस्कृति के अभिन्न अंग माने जाते थे,
लेकिन आज के दौर में ऐसे कई पारंपरिक संसाधनों का महत्व घट गया है। कारण
पानी सूख जाने से अधिकांश नौले-धारे खंडहर में तब्दील हो गये हैं। यदि कहीं
पानी हो भी तो पेयजल योजनाएं बन जाने से उनका उपयोग घट गया है।
बीसवीं शताब्दी से पहले पहाड़ के गांवों में धारे व नौलों का बहुतायत
प्रचलन था, तब योजनाएं न होने से ग्रामीण पानी के लिए पूर्ण रूप से इन्हीं
पर निर्भर रहा करते थे तथा यहां पर लोगों का जमघट लगा रहता था। इसीलिए ऐसे
पारंपरिक संसाधन यहां की सामाजिक एकता व संस्कृति के प्रतीक माने जाते रहे।
इधर बीते कुछ वर्षो से पर्याप्त बारिश न होने से अधिकांश प्राकृतिक स्रोत
सूख गए हैं। इसके साथ ही धारे व नौले भी खत्म हो गए हैं।
आज अधिकांश नौले सूख जाने के कारण खंडहर के रूप में तब्दील हो गये हैं।
वहीं कई ऐसे नौले भी हैं, जिनमें पानी तो है, लेकिन गांव में योजनाएं बन
जाने से उनका उपयोग बंद सा हो गया है। जो रखरखाव के अभाव में विरान से नजर आ
रहे हैं। इन्हें किसी को संरक्षित रखने की सुध नहीं है। पुराने जमाने के
बने कई ऐसे आलीशान नौले भी हैं, जो जर्जर हालत में पहुंच गये हैं। फिर भी
गांवों में आज भी कई ऐसे नौले हैं जो गर्मी में भी लोगों की प्यास बुझा रहे
हैं। विकास खंड अंतर्गत पन्याली, मासी-तया, झुडंगा, तल्ली त्याड़, जेठुवा
प्रावि, भगोती, पटलगांव व चिनौनी सहित कई ऐसे नौले हैं जो महज नहर के पानी
पर निर्भर रह गए हैं।
Jagaran.com

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